जम्मू-कश्मीर भारत का हिस्सा, तालिबान ने भी माना-
Edited by: Dhananjay Yadav
Last Updated: October 12, 2025
तालिबान का जम्मू-कश्मीर को भारत का हिस्सा मानना न केवल कूटनीतिक रूप से अहम है, बल्कि दक्षिण एशिया के शक्ति-संतुलन को भी प्रभावित करेगा। यह भारत की विदेश नीति की बड़ी सफलता है और पाकिस्तान के लिए एक गहरा झटका।
अफगानिस्तान के इस रुख से साफ है कि अब दुनिया जम्मू-कश्मीर को भारत का अभिन्न अंग मानने लगी है, और पाकिस्तान का अलगाववाद एजेंडा अब धीरे-धीरे कमजोर पड़ रहा है।
तालिबान ने मानी सच्चाई – जम्मू-कश्मीर भारत का अभिन्न अंग
अंतरराष्ट्रीय मंच पर एक ऐतिहासिक घटनाक्रम के तहत अफगानिस्तान की तालिबान सरकार ने पहली बार जम्मू-कश्मीर को भारत का हिस्सा माना है। भारत और अफगानिस्तान के बीच हुए संयुक्त बयान में “जम्मू-कश्मीर, भारत” शब्दों का प्रयोग किया गया, जिसने पाकिस्तान की राजनीति में भूचाल ला दिया है।
इस बयान को लेकर इस्लामाबाद में हड़कंप मच गया। पाकिस्तान ने तत्काल अफगानिस्तान के राजदूत को तलब कर आधिकारिक आपत्ति दर्ज कराई। हालांकि, यह पहली बार नहीं है जब पाकिस्तान को कूटनीतिक स्तर पर ऐसी शर्मिंदगी झेलनी पड़ी हो,
लेकिन इस बार मामला बेहद संवेदनशील है क्योंकि बयान किसी पश्चिमी देश ने नहीं, बल्कि तालिबान सरकार ने दिया है — जिसे पाकिस्तान कभी अपना रणनीतिक साथी मानता था।
तालिबान के विदेश मंत्री आमिर खान मुत्तकी की भारत यात्रा के बाद जारी इस बयान ने यह स्पष्ट कर दिया कि अब अफगानिस्तान भारत के साथ कूटनीतिक संबंधों को मजबूत करना चाहता है और आतंकवाद के मुद्दे पर पाकिस्तान के पक्ष में खड़ा नहीं है।
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भारत-अफगान रिश्तों में नया अध्याय – मुत्तकी और जयशंकर की मुलाकात
तालिबान प्रशासन के विदेश मंत्री आमिर खान मुत्तकी हाल ही में भारत आए, जहां उन्होंने विदेश मंत्री डॉ. एस. जयशंकर से मुलाकात की। इस मीटिंग को भारत-अफगान रिश्तों के नए अध्याय की शुरुआत माना जा रहा है।
दोनों नेताओं के बीच सुरक्षा, क्षेत्रीय स्थिरता, व्यापार और आतंकवाद विरोधी सहयोग जैसे अहम मुद्दों पर चर्चा हुई। मीटिंग के बाद जारी संयुक्त बयान में पहलगाम में हुए आतंकी हमले की कड़ी निंदा की गई,
और यह स्पष्ट किया गया कि अफगानिस्तान किसी भी रूप में सीमा पार आतंकवाद का समर्थन नहीं करता।
संयुक्त बयान में “जम्मू-कश्मीर (भारत)” लिखे जाने से तालिबान की मंशा साफ झलकती है – अफगानिस्तान अब अंतरराष्ट्रीय संबंधों में यथार्थवादी दृष्टिकोण अपनाना चाहता है। यह भी संकेत देता है कि तालिबान प्रशासन पाकिस्तान के प्रभाव से धीरे-धीरे बाहर निकल रहा है।
पाकिस्तान में मचा हंगामा – कूटनीतिक स्तर पर शर्मिंदगी
तालिबान के इस रुख के बाद पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय ने तुरंत प्रतिक्रिया दी। पाकिस्तान ने कहा कि अफगानिस्तान का यह बयान संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के प्रस्तावों का उल्लंघन है। इसके साथ ही पाकिस्तान ने इस बयान को “अस्वीकार्य” बताते हुए कड़ी नाराजगी जताई।
इस्लामाबाद में अफगानिस्तान के राजदूत को बुलाकर पाकिस्तान के अतिरिक्त विदेश सचिव ने अपनी आपत्ति दर्ज कराई। पाकिस्तान का तर्क है कि जम्मू-कश्मीर पर केवल यूएन प्रस्ताव लागू होते हैं, और किसी भी देश को इसे भारत का हिस्सा बताने का अधिकार नहीं है।
लेकिन इस बार हालात अलग हैं। तालिबान, जो कभी पाकिस्तान के संरक्षण में था, अब उसी पाकिस्तान के लिए सिरदर्द बनता जा रहा है। पिछले कुछ महीनों से पाकिस्तान पर अफगान सीमा से TTP (Tehreek-e-Taliban Pakistan) के हमले बढ़े हैं, जिनसे पाक सेना परेशान है।
मुत्तकी ने भी अपने बयान में साफ कहा –“आतंकवाद पाकिस्तान की आंतरिक समस्या है।”
विशेषज्ञों की राय – भारत की कूटनीति की बड़ी जीत
राजनयिकों और भू-राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि तालिबान का यह कदम भारत की कूटनीतिक जीत है। लंबे समय तक तालिबान को पाकिस्तान का “प्रॉक्सी” कहा जाता रहा, लेकिन अब वह धीरे-धीरे भारत की ओर झुकाव दिखा रहा है।
भारत ने हमेशा अफगानिस्तान की जनता के विकास के लिए सहायता प्रदान की है — चाहे वह सड़क निर्माण हो, स्वास्थ्य सेवाएं हों या शिक्षा। भारत की “सॉफ्ट डिप्लोमेसी” का यह प्रभाव अब नजर आने लगा है।
दूसरी ओर, पाकिस्तान की सैन्य नीतियां अब उसके ही खिलाफ काम कर रही हैं। TTP जैसे आतंकी संगठनों के हमलों ने पाकिस्तान की आंतरिक सुरक्षा को कमजोर कर दिया है।
अफगानिस्तान का यह बयान पाकिस्तान की उस पुरानी रणनीति को चुनौती देता है जिसके तहत वह कश्मीर मुद्दे को अंतरराष्ट्रीय मंचों पर उछालता रहा है।
विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले समय में अफगानिस्तान और भारत के बीच व्यापारिक और सुरक्षा संबंध और भी मजबूत होंगे। यदि तालिबान इस दिशा में आगे बढ़ता है, तो यह दक्षिण एशिया की राजनीति को पूरी तरह बदल सकता है.

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